मुद्रा के कार्य

पैसा क्या है इसे आपने पिछले पोस्ट में पढ़ा। इस आर्टिकल में मुद्रा के कार्य को जानेंगे। पैसा अर्थात Money. आज आप इसके कार्यों को विस्तार पूर्वक समझेंगे।

मुद्रा के कार्य | Function of Money

Money का केवल एक मौलिक कार्य है माल तथा सेवाओं के लेन देन को सरल बनाना। मुद्रा के इस कार्य से लेन-देन में लगने वाले समय तथा परिश्रम की बचत होती हैं। वास्तव में मुद्रा का कार्य लेनदेन को इतना अधिक सरल और सस्ता बनाना है कि उत्पादन में जितने भी माल बने वह नियमित रूप में उपभोक्ताओं के पास पहुंचता रहे और भुगतान का क्रम निरंतर चलता रहे।

इस प्रकार से आज के समय में मुद्रा वाणिज्य (Commerce) के लिए एक पहिए का कार्य करती हैं।मुद्रा के सभी कार्यों को निम्नलिखित 4 वर्गों में विभाजित किया गया हैं।

मुद्रा के कार्य का वर्गीकरण

इसके कार्य का वर्गीकरण मुख्य रूप से चार भागों में किया गया हैं –

  1. मुख्य या प्राथमिक कार्य
  2. सहायक कार्य
  3. अकास्मिक कार्य
  4. अन्य कार्य

आइए इन सभी के बारे में एक-एक करके विस्तार से समझते हैं।

मुख्य या प्राथमिक कार्य (Primary Function)

आज के समय में मुद्रा का मुख्य कार्य दो है – a. यह विनिमय का माध्यम है b. यह मूल्यों की माप हैं।

विनिमय का माध्यम – विनिमय का साधारण अर्थ होता है एक दूसरे से अदला-बदली करना। वस्तु विनिमय तभी हो पाता है जब दो व्यक्ति किसी वस्तु को देने व लेने को तैयार हो जाते हैं। वस्तुओं के विनिमय में दोहरा संयोग बनाने में समय और शक्ति भी व्यर्थ नष्ट होती थीं। मुद्रा ने वस्तु विनिमय की दोहरे संयोग की कठिनाइयों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया हैं। मुद्रा विनिमय की प्रक्रिया को बहुत सरल बना दिया है अब वस्तुओं का विनिमय प्रत्यक्ष ना होकर परोक्ष में होता हैं।

मूल्य मापक – वस्तु विनिमय में वस्तुओं के मूल्य को मापने की कठिनाई थी अर्थात एक वस्तु की एक निश्चित मात्रा प्राप्त करने के लिए बदले में एक दूसरा सामान कितनी मात्रा में देना होगा। वर्तमान में प्रत्येक वस्तु और सेवा का मूल्य मुद्रा में ही मापा जाता है और इस प्रकार मुद्रा ने सामान्य मूल्य के मापक का कार्य करके वस्तु विनिमय की उपर्युक्त कठिनाई को दूर कर दिया हैं।

सहायक कार्य (Secondary Function)

उपरोक्त कार्यो के अलावा मुद्रा के कुछ गौण कार्य भी होते हैं –

  • भविष्य के भुगतानों का आधार – आज का संपूर्ण आर्थिक ढांचा साख पर आधारित है और साख अथवा उधार मुद्रा के रूप में ही दी जाती हैं। मुद्रा के प्रचलन से उधार क्रय- विक्रय प्रारंभ हुआ । कोई व्यक्ति आज किसी माल का क्रय करके भविष्य में उसका भुगतान कर सकता हैं।

  • कोष का आधार – मनुष्य स्वभाव से भविष्य की सोचता है वह भविष्य की अचानक आपदाओं तथा संकट, समाजिक तथा व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी वर्तमान आय का कुछ भाग बचाकर रखना चाहता हैं, परंतु उसे यह विश्वास होना चाहिए कि उसकी बचत सुरक्षित है और वह उसका प्रयोग किसी भी समय कर सकता हैं। मुद्रा न केवल इन शर्तों की पूर्ति करती है बल्कि वह सरलता से थोड़े ही स्थान पर जमा करके रखी जा सकती हैं।

अकास्मिक कार्य

मुद्रा के कार्य के अंतर्गत मुख्य चार बिंदु को सम्मिलित किया गया है –

  • साख का आधार – बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं का व्यवसाय साख के आधार पर ही चलता है तथा साख का सृजन बैंकों में जमा राशि के आधार पर किया जाता हैं। यह साख मुद्रा के रूप में होती हैं। वर्तमान में अधिकांश भुगतान चेक, हुंण्डी, विनिमय पत्र तथा साख पत्रों के माध्यम से किया जाता हैं।

  • आय का वितरण – आज के समय में व्यापार तथा उद्योगों में बहुत तेजी से वृद्धि हुई हैं। औद्योगिक उत्पादन व्यापक पैमाने पर हो रहा है जिसमें बहुत से लोग मिलकर उत्पादन करते हैं। उत्पादन में उनके सहयोग का प्रतिफल दिया जाना आवश्यक होता हैं। संयुक्त रूप से किए गए उत्पादन को बेचकर प्राप्त धनराशि को विभिन्न लोगों में बांटा जा सकता हैं। यह परिस्थिति मुद्रा के कारण ही संभव हो पाई हैं।

  • संपत्ति की तरलता का आधार – मुद्रा संपत्ति को तरल रूप प्रदान करती हैं। भूमि, मकान, मशीनें इत्यादि बेचने से इनके बदले में मुद्रा प्राप्त होती हैं। यह नगद राशि अधिकतम लाभ देने वाले स्थानों, केन्द्रों अथवा Business में सरलता से भेजी जा सकती है और इससे अधिकतम लाभ कमाया जा सकता हैं। वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा तरल के रूप में ही रखना चाहता हैं।

  • पूंजी को सामान्य रूप प्रदान करने का साधन – मनुष्य अपनी आय के एक भाग को बचा कर रखता है यह बचत ही पूंजी का रूप धारण करते हैं। मुद्रा द्वारा ही पूंजी को ऐसे विनियोग में हस्तांतरित किया जा सकता है जहां उसकी उत्पादकता तुलनात्मक रूप से अधिक हो। इससे पूंजी की गतिशीलता और उत्पादकता में वृद्धि होती हैं।

अन्य कार्य

इच्छा की वाहक – ग्राहक के अनुसार मुद्रा संचय का आधार हैं। इसको जमा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति इस बात का ध्यान रख सकता है कि उसे संचित संपत्ति कब उपयोग में लाने है मुद्रा समाज की वर्तमान एवं भविष्य की पूर्ति में सहयोग देती है।

भुगतान स्थिति की सूची – किसी फर्म या व्यक्ति के पास मुद्रा-रुपी तरल संपत्ति उसकी भुगतान देने की क्षमता की गारंटी होती हैं। बैंकों के पास यदि ग्राहकों को देने के लिए पर्याप्त Amount नहीं होती तो वह दिवालिया हो जाते। इस प्रकार मुद्रा इस बात की सूचक है कि कोई संस्था दिवालिया तो नहीं हो गयी है।