एक संस्था में कई प्रकार के लोग कार्य करते हैं। समन्वय का होना आवश्यक है। समन्वय संस्था या कंपनी में कार्यरत कर्मचारी तथा प्रबंधकों के बीच संतुलन बनाए रखता है। तो चलिए नीचे की पोस्ट में इसे (समन्वय का अर्थ क्या होता है) जानते हैं और साथ ही समन्वय की विशेषताएं,आवश्यकता, महत्व, तत्व तथा समन्वय की आवश्यकता प्रबंध के सभी स्तरों पर होती है उसे भी जानेंगे।

समन्वय का अर्थ क्या होता हैं

समन्वय का शाब्दिक अर्थ है संतुलन स्थापित करना। निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति हेतु विभिन्न गतिविधियों में सामंजस्य स्थापित करना ही ‘समन्वय’ Co- ordination कहलाता है।
अतः समन्वय वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक संस्था में की जाने वाली विभिन्न प्रक्रियाओं में सामंजस्य स्थापित किया जाता है ताकि संस्था के लक्ष्य एवं उद्देश्य को प्रभावपूर्ण ढंग से प्राप्त किया जा सके।

समन्वय की विशेषताएं

किसी व्यवसाय के विभिन्न अंगों में सामंजस्य स्थापित करना ‘समन्वय’ कहलाता हैं। समन्वय की विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • समन्वय एक सतत प्रक्रिया हैं।
  • समन्वय स्थापित करने का कार्य प्रबंधकों का होता हैं।
  • इसके स्थापित करने का मुख्य उद्देश्य संस्था के लक्ष्य को प्राप्त करना होता हैं।
  • यह सामूहिक प्रयासों को क्रमानुसार संयोजित करता हैं।
  • यह सभी क्रियाओं में एकरूपता लाता हैं।
  • समन्वय सामूहिक प्रयास के अनावश्यक अपव्यय को रोकता हैं।
  • समन्वय प्रबंध का सार हैं अर्थात इसे प्रबंध का आत्मा भी कहा जाता हैं।

समन्वय की आवश्यकता एवं महत्व

समन्वय की आवश्यकता एवं महत्व निम्नलिखित हैं जो इस प्रकार से दिए गए हैं-
1. आदेश और निर्देश की एकता
2. विविधता में एकता
3. कुल उपलब्धि में वृद्धि
4. ऊंचे कर्मचारी मनोबल
5. मानवीय संबंधों पर बल

1. आदेश और निर्देश की एकता – समन्वय से कर्मचारियों को एक समय में एक ही अधिकारी से आदेश एवं निर्देश प्राप्त होते हैं जिससे कार्य को बहुत ही आसानी से संपन्न किया जाता हैं।

2. विविधता में एकता – समन्वय होने से संस्था में कार्यरत विभिन्न जाति एवं धर्म के कर्मचारियों के बीच भेदभाव समाप्त हो जाता हैं और एकता का संचार होता हैं।

3. कुल उपलब्धि में वृद्धि – समन्वय से संस्था का सारा काम समय पर संपादित होता हैं। कर्मचारियों की कार्य क्षमता में वृद्धि होती है। परिणामस्वरुप संस्था की कुल उपलब्धि में बढ़ोतरी होती हैं।

4. ऊंचे कर्मचारी मनोबल – समन्वय होने से संस्था में कार्यरत कर्मचारियों के बीच मधुर संबंध स्थापित होता है जिससे उन्हें अपने कार्य में संतुष्टि प्राप्त होता है परिणाम स्वरूप उनका मनोबल ऊंचा उठता है।

5. मानवीय संबंधों पर बल – इससे कर्मचारियों एवं अधिकारियों के बीच मानवीय संबंध बनाने पर बल दिया जाता है।इसे संस्था में सौहर्दपूर्ण वातावरण का निर्माण होता है।

 

समन्वय के चार तत्व बताएं

1. एकीकरण एवं सहयोग
2. संतुलन
3. समय
4. प्रभावी संदेशवाहन

1. एकीकरण एवं सहयोग – चुकिं प्रत्येक संस्था तथा कंपनी में कई प्रकार के लोग तथा कई विभाग होते हैं और सभी विभाग में लोग कार्य करते हैं। इन सभी के बीच क्षमता,आवश्यकता,जिम्मेदारी में अंतर होता है। समन्वय इनमें परस्परिक तालमेल एवं सहयोग स्थापित करता है ताकि संस्था के द्वारा निर्धारित लक्ष्य एवं उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकें।

2. संतुलन – किसी भी कार्य में संतुलन आवश्यक है। समन्वय संस्था में कार्यरत विभिन्न कर्मचारियों, प्रबंधकों के बीच संतुलन स्थापित करता है। यह इसका एक मुख्य तत्व है। प्रत्येक व्यक्तियों, कर्मचारियों एवं विभागों के लक्ष्य निर्धारित करके उनकी क्रियाओं को एक सूत्र में पिरोता हैं। जिससे संस्था के लक्ष्य एवं उद्देश्य को प्राप्त किया जा सके।

3. समय – ‘समय बहुत ही मूल्यवान है’ यह कहावत आपने जरूर सुना होगा। एक कंपनी में कई प्रकार के क्रियाकलाप किए जाते हैं प्रत्येक कार्य सही समय पर संपादित हो इसके लिए समन्वय का तत्व जरूरी हैं।

4. प्रभावी संदेशवाहन – एक संस्था में कई स्तर होते हैं उन सभी स्तरों के बीच प्रभावी संदेश आवश्यक है ताकि सभी संस्था के लक्ष्य, उद्देश्य को प्राप्त करने में अपना पूरा उर्जा लगा सके।

 

अन्य प्रश्न

Q.1. समन्वय की आवश्यकता प्रबंध के सभी स्तरों पर होती है? कैसे।

उत्तर – समन्वय की आवश्यकता तब होती है जब काम को सामूहिक प्रयास द्वारा किया जाए। यदि काम को एक व्यक्ति द्वारा किया जाए तो वहाँ समन्वय की आवश्यकता नहीं होगी। प्रबंध के तीन स्तर होते हैं – उच्च स्तर, मध्य स्तर तथा निम्न स्तर । प्रबंध के प्रत्येक काम अनेक व्यक्तियों द्वारा सामूहिक रूप से पूरा किया जाता है और काम को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए उनमें समन्वय की आवश्यकता होती है। इसके अलावा यदि तीनों को एक साथ देखा जाए तो यह भी एक समूह बन जाता है और समूह का नाम आते ही समन्वय की जरूरत महसूस होने लगती है।
अतः हम कह सकते हैं कि प्रबंध के तीनो स्तरों पर व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से समन्वय की आवश्यकता होती हैं।