आयगत एवं पूंजीगत व्यय

अगर आप बिजनेसमैन है या फिर बनना चाहते हैं तो आपको आयगत एवं पूंजीगत व्यय के बारे में जानकारी अवश्य होनी चाहिए। इसमें विस्तार से चर्चा की गई है।आयगत एवं पूंजीगत व्यय को समझने से पहले आय,पूंजी तथा व्यय के बारे में जानेंगे।

आय (Income)– साधारण शब्दों में आय को आमदनी, लाभ से जानते हैं। आय से आश्य “किसी ऐसे कार्य को करने से है जिसके बदले में धन प्राप्त होता हो एवं उसे मुद्रा में भी अभिव्यक्त किया जा सके।
उदाहरण – मान लीजिए S नाम का कोई व्यक्ति Palji Ltd. में काम करता है काम करने के बदले में जो राशि मिलती है वह S का आमदनी हैं।

Income = Revenue – Expenditure

पूंजी (Capital)- पूंजी से आश्य जमा किया हुआ धन से लगाया जाता हैं। आय देने के लिए व्यवसाय में जो धन लगाया जाता है उसे पूंजी कहते हैं।

व्यय (Expenditure)– व्यय से आश्य खर्च,क्षय, नाश आदि से लगाया जाता है यानी कि आप किसी वस्तु या पदार्थ को खरीदने में जो पैसा खर्च करते हैं, पैसा खर्च करना ही व्यय कहलाता हैं। अगर यही पैसा किसी ऐसे वस्तु खरीदने के लिए किया गया हो जिससे आय प्राप्त हो तो उसे निवेश (Investment) कहा जाएगा।

आयगत व्यय क्या हैं?

ऐसे व्यय जिसका लाभ एक ही लेखांकन अवधि में प्राप्त हो जाता है और इसके अलावा किसी व्यय से व्यापार की लाभ अर्जन क्षमता में अथवा स्थाई संपत्तियों में वृद्धि नहीं होती है “आयगत व्यय” कहलाता हैं।

आयगत व्यय की विशेषताएं

  1. यह व्यय एक लेखांकन अवधि में ही प्राप्त हो जाता हैं।
  2. आयगत व्यय की दूसरी विशेषता यह है कि यह अल्पकालीन होता हैं।
  3. इससे Trading And Profit & Loss A/C के डेबिट भाग में लिखा जाता हैं।
  4. आयगत व्यय की प्रकृति आवर्ती होती हैं।
  5. आय को बनाए रखने की प्रकृति वाले व्यय आयगत व्यय होते हैं।

आयगत व्यय उदाहरण

  • मजदूरी, वेतन, किराया, बिजली के बिल।
  • चालू संपत्तियों को खरीदने में किया जाने वाला व्यय।
  • एक व्यापार को सुचारू रूप से चलाने के लिए जो व्यय होते हैं दिन प्रतिदिन के वही आयगत व्यय हैं।

आयगत प्राप्ति क्या हैं?

आयगत प्राप्तियों से आश्य उन प्राप्तियों से हैं जो सामान्य व्यवसायिक क्रियाओं से उत्पन्न होती है इसे आय- विवरण में दिखाया जाता है और आवर्ती प्रकृति के होते हैं।

पूंजीगत व्यय की परिभाषा दीजिए

ऐसा व्यय जिसका लाभ एक ही लेखा वर्ष में प्राप्त ना होकर भविष्य में कई वर्षों तक मिलते-रहता है “पूंजीगत व्यय” कहलाता है। इसके अंतर्गत उन सभी व्ययों को शामिल किया जाता है जो किसी स्थायी संपत्तियों को प्राप्त करने में किए जाते हैं।

पूंजीगत व्यय की विशेषताएं

  1. पूंजीगत व्यय का लाभ सिर्फ एक वित्तीय वर्ष तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि इसका लाभ भविष्य में कई सालों तक होता रहता हैं।
  2. यह गैर-आवर्त प्रकृति के होते हैं।
  3. पुराने संपत्ति के जगह पर नए संपत्ति से संबंधित व्यय
  4. इसे Balance Sheet के संपत्ति पक्ष में दर्शाया जाता हैं।
  5. इससे संबंधित व्यय खाता को डेबिट किया जाता हैं।

पूंजीगत व्यय उदाहरण

पूंजीगत व्यय के उदाहरण अनेक हैं। जिनमें से कुछ नीचे दिए गए हैं-

  • Trade Mark , Copyright, Patent
  • संपत्ति के विस्तार करने पर किए जाने वाले खर्च
  • जमीन- जायदाद तथा भवन की लागत
  • ख्याति के लिए चुकाई गई राशि

पूंजीगत व्यय और आयगत व्यय में अन्तर

अंतर का आधार¯

पूंजीगत व्यय

आयगत व्यय

अर्थ

जो व्यय जिसका लाभ एक ही लेखांकन वर्ष में प्राप्त न होकर कई वर्षों तक प्राप्त होते रहता हैं।

वैसा व्यय जिसका लाभ एक ही लेखांकन वर्ष में प्राप्त हो जाता हो।


आमदनी के स्रोत

वैसा व्यय जो आय स्रोत की प्राप्ति से संबंधित होते हैं पूंजीगत व्यय होते हैं।

आय कमाने के लिए किया गया व्यय आयगत व्यय होता हैं।

उदाहरण

एक एजेंसी या लाइसेंस प्राप्त करने के लिए व्यय की गई राशि

कच्चे माल के क्रय पर होने वाला आयगत व्यय हैं।

पूंजी जुटाने

पूंजी इकट्ठा करने के लिए किया गया व्यय। इसमें अंशो के निर्गमन के लिए दिए गए कमीशन, कानून व्यय आदि शामिल हैं।

अंशधारियों को भुगतान किया गया लाभांश।

सुधार

संपत्ति की लाभ अर्जन क्षमता में वृद्धि या सुधार करने के लिए किया गया व्यय।

व्यवसाय की लाभ अर्जन क्षमता बनाए रखने के लिए।

स्थगित आयगत व्यय क्या हैं

वैसे आयगत व्यय जिसकी उपयोगिता कई वर्षों तक रहती हैं व राशि अधिक होती है “स्थगित आयगत व्यय” कहते हैं। इसे संक्षेप में DRE (Deferred Revenue Expenditure) कहा जाता हैं। स्थगित आयगत व्यय के उदाहरण – प्रारंभिक व्यय, ऋणपत्रों के निर्गमन पर छूट एवं कमीशन तथा असाधारण हानि होने पर।

विशेषताएं

  • यह एक आकस्मिक तथा सामान्यता: बड़ी धनराशि होते हैं।
  • यह पूंजीगत आयगत व्यय होता हैं।
  • इसके लाभ उस वर्ष में प्रयुक्त नहीं होते हैं जिससे ये संबंधित होते हैं।

पूंजीगत प्राप्ति क्या है?

पूंजीगत प्राप्ति से आश्य ऐसी संपत्तियों से है जो कुछ आकस्मिक अथवा गैर-आवर्ती लेनदेन से उत्पन्न होती है और व्यवसाय की सामान्य क्रियाओं से नहीं। यह गैर-आवर्ती प्रकृति के होते हैं।